एंटनी क्लेमेंट रुबिन बनाम भारतीय संघ

यश जैनCase SummaryLeave a Comment

एंटनी क्लेमेंट रुबिन बनाम भारतीय संघ

एंटनी क्लेमेंट रुबिन बनाम भारतीय संघ
मद्रास उच्च न्यायालय
रिट याचिका 20774/2018 और 20214/2018
न्यायाधीश एस मणिकुमार और न्यायाधीश सुब्रमण्यम प्रसाद के समक्ष
निर्णय दिनांक: 28 अगस्त 2018

मामले की प्रासंगिकता: किसी ईमेल या यूज़र अकाउंट को बनाते समय प्रमाणीकरण के लिए आधार कार्ड या अन्य कोई सरकार द्वारा अधिकृत पहचान प्रमाण को अनिवार्य रूप से लिंक करना

सम्मिलित विधि और प्रावधान

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (धारा 2(1)(w), 69)

मामले के प्रासंगिक तथ्य

  • याचिकाकर्ताओं द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाएं दायर की गई हैं।
  • याचिकाकर्ता एक परमादेश (mandamus) रिट जारी करने की मांग कर रहे हैं, जिसमें प्रतिवादियों को यह घोषित करने का निर्देश दिया जाए कि ईमेल या यूज़र अकाउंट (सोशल मीडिया अकाउंट्स – फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ट्विटर या यूटिलिटी अकाउंट, पेटीएम, उबर, ओला, जीमेल, याहू और हॉटमेल) को आधार कार्ड या अन्य किसी सरकार द्वारा अधिकृत पहचान प्रमाण से लिंक किया जाए।
  • साथ ही, हर दिन साइबर मानहानि और साइबर स्टाकिंग के बढ़ते मामलों की निगरानी और भारत के निर्दोष पीड़ित ई-नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक विशेष और कुशल टास्क फोर्स की नियुक्ति की जाए।

न्यायपीठ की राय

  • आईटी एक्ट की धारा 2(1)(w) इंटरमीडियरी को इस तरह परिभाषित करती है: किसी विशेष इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के संबंध में, कोई भी व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति की ओर से उस रिकॉर्ड को प्राप्त, संग्रहीत या प्रसारित करता है या उस रिकॉर्ड के संबंध में कोई सेवा प्रदान करता है और इसमें दूरसंचार सेवा प्रदाता, सर्च इंजन, ऑनलाइन पेमेंट साइट, ऑनलाइन नीलामी साइट, ऑनलाइन मार्केट और साइबर कैफे शामिल हैं।
  • आईटी एक्ट की धारा 69, किसी भी कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से किसी भी जानकारी को रोकने, निगरानी रखने या डिक्रिप्ट करने के लिए निर्देश जारी करने की शक्ति से संबंधित है।
  • धारा 69(1) में कहा गया है कि जहां केंद्र सरकार या राज्य सरकार या उनके द्वारा विशेष रूप से अधिकृत कोई अधिकारी अगर इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि भारत की संप्रभुता या अखंडता, भारत की रक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों या लोगों के हित के लिए कोई कदम उठाने की ज़रुरत है तो वह कारण को लिखित रूप से दर्ज करके आदेश द्वारा, उपयुक्त सरकार की किसी एजेंसी को किसी भी कंप्यूटर संसाधन में उत्पन्न हुई, प्रेषित, प्राप्त या संग्रहीत कोई भी जानकारी को रोकने, निगरानी या डिक्रिप्ट करने का निर्देश दे सकता है।
  • इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि जब कानूनी आदेश द्वारा आवश्यक हो, तो इंटरमीडियरी सरकारी एजेंसियों को जानकारी या ऐसी कोई सहायता प्रदान करेगा जो उन्हें जांच में आवश्यक हो।
  • सूचना या ऐसी कोई भी सहायता पहचान के सत्यापन के उद्देश्य से, या रोकथाम, पता लगाने, जांच, अभियोजन, साइबर सुरक्षा घटनाओं और किसी भी कानून के तहत अपराधों की सजा के लिए स्पष्ट रूप से लिखित रूप में अनुरोध पर प्रदान की जाएगी।

अंतिम निर्णय

  • वर्तमान मामले में, हालांकि चेन्नई के साइबर सेल द्वारा विवरण प्रदान करने के लिए अनुरोध किया गया है, लेकिन सोशल मीडिया कंपनियों ने कई मामलों में निवेदन को खारिज कर दिया है और मांगी गई जानकारी को भी प्रस्तुत नहीं किया है।
  • इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि कुछ प्रकार की सूचना का प्रसारण भारतीय कानून के तहत दंडनीय अपराध है, कानून लागू करने वाली एजेंसियां ​​मध्यस्थों (intermediary) से जांच/पता लगाने के लिए और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश) नियम, 2011 के नियम 3 के अनुसार विवरण प्रस्तुत करने का अनुरोध करती हैं। मध्यस्थ अपने कर्तव्यों के निर्वहन में उचित परिश्रम का पालन करेगा।
  • न्यायालय का विचार है कि फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, व्हाट्सएप, गूगल आदि जैसे प्लेटफॉर्म जिनसे जांच के लिए जानकारियां मांगी गई है, साइबर अपराध, पुलिस आयुक्त, को सुना जाना आवश्यक है कि उन्हें इन रिट याचिकाओं में पार्टी प्रतिवादी के रूप में क्यों नहीं बनाया जाए।
  • फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, व्हाट्सएप, गूगल को नोटिस का आदेश दिया गया था, जिसे 18.09.2018 तक वापस किया जा सकता है।

इस केस सारांश को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। | To read this case summary in English, click here.

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