सोशल मीडिया चलाने की न्यूनतम आयु क्या है?

यश जैनLaw1 Comment

सोशल मीडिया चलाने की न्यूनतम आयु क्या है

वर्चुअल दुनिया में यह स्पष्ट है कि भारत अब राज्यों द्वारा बाध्य नहीं रहा है। हम अपने जीवन में वर्चुअल रूप से लोगों से अधिक एकजुट और जुड़े रहने का प्रयास करते हैं। सोशल मीडिया वेबसाइटें बच्चों के लिए सबसे अच्छे स्थानों में से एक है और व्यस्त माता-पिता के लिए अपने दोस्तों और परिवार से जुड़ने का माध्यम भी है। लेकिन हम वास्तव में हमारे इस वर्चुअल लाइफ को कहां ले जा रहे हैं? क्या इस भारत देश के बच्चे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? क्या वे सुरक्षित हैं? जिस तरीके से सर्फिंग करना चाहिए क्या वे उस तरीके से कर रहे हैं? पहले सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे ऑरकुट और फेसबुक का इस्तेमाल ज्यादा होता था, अब दुनिया व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक आदि जैसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने लगी है। सोशल नेटवर्किंग ने संचार और जानकारी को शेयर करने के नए तरीकों को प्रोत्साहित किया है।

भूमिका

ऑनलाइन होने वाली संचार व्यवस्था दुनिया के फायदे और नुकसान को समझने की बच्चों की क्षमता को कम करती हैं। सोशल नेटवर्किंग व्यक्तिवाद (individualism) शैली का निर्माण कर रहा है, जिसमें समाज और देश के पहले व्यक्ति आता है। व्यक्तिवाद रिश्ते को समझने और स्वीकार करने की आदत को रोकता है। सोशल नेटवर्किंग के अनियंत्रित इस्तेमाल में वृद्धि के साथ, बच्चे ऑनलाइन धोखाधड़ी और आक्रामक मार्केटिंग की चपेट में आ रहे हैं। जैसे शादी करने के लिए एक उम्र है, काम करने के लिए एक उम्र है, वैसे ही सोशल मीडिया चलाने के लिए भी एक उम्र होना चाहिए। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

एक बच्चे को वेब से परिचित कराने के लिए कौन सी उम्र सही है? दूसरे देशों के लिए यह करीब 13 साल है। भारत में हमारे यहां अलग स्थिति है। भारत का कानूनी ढांचा 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को सोशल नेटवर्क से जुड़ने की अनुमति नहीं देता है। कुछ कारणों से, फर्जी उम्र की प्रोफाइल बनाकर इन नेटवर्क से जुड़ना बच्चों के लिए बहुत गर्व की बात है। आप अपने आसपास देख सकते हैं और कई ऐसे उदाहरण पाएंगे जहां एक 14 साल का बच्चा पहले से ही फेसबुक पर 25 साल का है।

कानून क्या कहता है?

हालाँकि भारत में, फेसबुक द्वारा बताई गई 13 वर्ष की न्यूनतम उम्र भी लागू क्यों नहीं है, यह एक अजीब मुद्दा है। ‘एक बच्चा कौन है?’ इसकी परिभाषाओं की संख्या विविध है, आईपीसी कुछ कहता है, बाल विवाह और निषेध अधिनियम, 1929 कुछ और कहता है। लेकिन हम कानूनी तौर पर देखें तो हमें भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 और भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 को देखना चाहिए, जो स्पष्ट रूप से 18 साल की आयु सीमा स्पष्ट करता है। तो क्या इसका मतलब यह है कि अपने बचपन में जो हमने I Agree और Yes, Please बटन पर क्लिक करा है उसका कोई मतलब नहीं है?

कानूनी तौर पर तो यह एक सोचने वाली बात है। इस मुद्दे पर कोई भी मामला सामने नहीं आया है जिससे कि भारतीय कानूनी प्रणाली का रुख इस पर थोड़ा अस्थिर है। यह एक खुला प्रश्न है और चिंता का विषय है जो भारत के कई लोग और दूरदर्शियों ने चर्चा के लिए उठाया है।

रिट याचिका (सिविल) 3672/2012 में क्या हुआ?

2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह पूछा कि वे बताएं कि फेसबुक और गूगल जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर वे 18 साल से कम उम्र वाले बच्चों को अकाउंट खोलने की अनुमति कैसे दे रहे थे। जब भाजपा के पूर्व नेता के.एन. गोविंदाचार्य (मामले के याचिकाकर्ता) के वकील ने दों साइटों पर उनके उपयोगकर्ताओं के विवरण को सत्यापन नहीं करने का आरोप लगाया, तब न्यायाधीश बी.डी. अहमद और न्यायाधीश विभू बाखरू की एक खंडपीठ ने 10 दिन के भीतर सरकार से जवाब मांगा। मामले को अग्रिम सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया गया था।

न्यायपीठ ने फेसबुक और गूगल को भी याचिका के पक्षकारों के रूप में माना और उन्हें नोटिस जारी किए। उनकी भारतीय सहायक कंपनियों ने याचिका का जवाब दिया था। इससे पहले, याचिकाकर्ता के लिए दलील देने वाले अधिवक्ता विराग गुप्ता, ने कहा कि साइटों के साथ नाबालिगों द्वारा जो करार (agreements) हुए हैं वह भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872, और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के विरुद्ध है। जून 2012 में, फेसबुक ने अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (U.S. Securities and Exchange Commission) के सामने एक बयान में कहा कि उसके पंजीकृत उपयोगकर्ताओं में से 8 करोड़ से अधिक ने अकाउंट बनाते वक्त झूठी जानकारी दी थी।

न्यायालय ने 13 वर्ष की आयु के बच्चों को अनुमति देने पर क्या कहा?

रिट याचिका (सिविल) 3672/2012 की जून 2012 से अप्रैल 2016 तक की सभी सुनवाई को देखने के बाद समझ आता है कि माननीय न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 23.08.2013 में केवल 13 वर्ष की आयु के बच्चों को अनुमति देने पर चर्चा की है। जहां तक ​​इस आदेश का संबंध है, अदालत ने केवल यह माना कि 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की अनुमति नहीं है, इस बात में कोई विवाद नहीं है। ऐसा लगता है कि अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील पर ध्यान नहीं दिया कि नाबालिगों का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए साइन अप करना भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 और ऐसे अन्य कानूनों का उल्लंघन है।

इसके अलावा, ऐसा प्रतीत होता है कि इस याचिका में मुद्दा यह था कि क्या इंटरमीडियरी 2011 के दिशानिर्देशों का अनुपालन कर रहे हैं या नहीं। अदालत द्वारा इस विषय पर की गई चर्चा को आनुषंगिक उक्ति (obiter dicta) माना जायेगा।

साइबर कानून विशेषज्ञों का कहना था कि याचिका में योग्यता हो सकती है, क्योंकि दुर्व्यपदेशन (misrepresentation) दंडात्मक कार्यवाही को आमंत्रित कर सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत एक फर्जी/मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाना अपराध है और भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 465 के तहत यह अपराध 2 साल तक के कारावास को आमंत्रित करता है और अगर धोखे के उद्देश्य से खोले गए अकाउंट का इस्तेमाल होता है तो यह 7 साल तक के कारावास के साथ दंडनीय होगा। आईपीसी और आईटी एक्ट के तहत उन बच्चों पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है जो इन वेबसाइटों पर अकाउंट खोलने के लिए अपनी उम्र के बारे में खुले तौर पर झूठ बोलते हैं और उन माता-पिता पर भी जो अपने नाम पर अकाउंट खोलने के दौरान जानते हुए भी अपने बच्चों की गलत जानकारी देते हैं। कानून की अनदेखी कोई बहाना नहीं है।

यूरोपियन परिषद् के समझौते से हम क्या सीख सकते है?

कुछ साल पहले हुए कुख्यात यूरोपीय परिषद समझौते पर ध्यान नहीं दिया जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता।  लंदन में, गूगल, फेसबुक, याहू और माइक्रोसॉफ्ट सहित कुछ 17 वेब फर्मों ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग करते समय बच्चों को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए पहले यूरोपीय समझौते पर हस्ताक्षर किया था। वे प्रमुख खतरे जो उन्होंने यूरोप में पाए थे उनसे निपटने के लिए सोशल नेटवर्किंग टास्क फाॅर्स की स्थापना की गई थी। सोशल नेटवर्क वालों ने यह सहमति व्यक्त की कि वे एक सुलभ और आसानी से उपयोग किए जाने वाला “रिपोर्ट अब्यूज” (गलत इस्तेमाल होने पर सूचना देने वाला) बटन प्रदान करेंगे। वो ये भी सुनिश्चित करेंगे कि पूरी ऑनलाइन प्रोफाइलें और वेबसाइट उपयोगकर्ताओं की संपर्क सूची, जो 18 वर्ष से कम है, डिफ़ॉल्ट रूप से प्राइवेट पर सेट रहेगी, और कम उम्र के उपयोगकर्ताओं को उनकी सेवाओं के इस्तेमाल करने से रोकेंगे।

क्या करने की आवश्यकता है?

अगर यूरोप अपनी व्यवस्था में ऐसे अभिनव कदम ले सकता है, जहां भारत की तुलना में इतने उपयोगकर्ता भी नहीं है, तो क्या भारतीय कानून विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कानूनी रूप से बच्चों को सहयोग करने के लिए अपने आप को मज़बूत करने की कोशिश नहीं कर सकता है? इस मुद्दे से निपटने के लिए कुछ सुझाव इस प्रकार है:

  • 13 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग के लिए प्रावधान लाना।
  • समस्या यह है कि बच्चे अपने माता-पिता से झूठ बोलते हैं। उन्हें लगता है कि उनके माता-पिता उन्हें सोशल नेटवर्क का उपयोग करने से रोकेंगे या उनका इंटरनेट बंद कर देंगे। माता-पिता और बच्चों को आपस में जोड़ने के लिए संभावित तरीकों का अन्वेषण किया जाना चाहिए।
  • सुधारों के लिए भारतीय सरकार को सोशल नेटवर्कों से समझौता करना चाहिए।
  • एक पैनिक बटन, 18 वर्ष से कम उम्र के उपयोगकर्ताओं को सर्च के दायरें से बहार करना, और सामग्री सीमा को परिभाषित करना चाहिए।
  • बच्चों को कानून के बारे में बताया जाए ताकि वे उनके द्वारा किये जाने वाले हरकतों से डर सके।

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